मदर्स डे विशेष: कहानी मिताली होर की – स्टेशन पर व्हीलर बुक स्टॉल से लेकर चाऊमिन और मोमो की दुकान तक का सफ़र

आवाज स्पेशल

अरविंद अग्रवाल। किशनगंज

आज मदर्स डे मनाया जा रहा है। भारतीय संस्कृति में मदर्स डे मनाया जाना कितना सही या गलत है इस विषय पर संवाद-विवाद से इतर एक माँ की कहानी आज हम आपके सामने रखने जा रहे हैं। ऑनलाइन शॉपिंग के इस दौर में जहाँ फ्लिपकार्ट और अमेज़न जैसी वेबसाइटे मोबाइल फोन से लेकर साड़ियों तक मे डिस्काउंट देकर अपनी माँ के प्रति प्रेम को दर्शाने के लिए प्रेरित कर रही है, वही दूसरी ओर मेक माय ट्रिप कह रहा है कि अपनी माँ को डिस्काउंट में कश्मीर की सैर करवा लाइये।

अमूल्य रिश्तों के व्यावसायिक दोहन से दूर ये कहानी मातृसत्ता के महत्व को दर्शाती हैं। वर्ष 1949 के वसंत में पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार से मुकुल होर अपनी पत्नी मिताली होर के साथ अपनी ज़िंदगी संवारने निकले थे। ये समय इनकी ज़िन्दगी का भी वसंत ही था। 1950 के दशक में इन्हें कटिहार रेलवे स्टेशन पर ए. एच. व्हीलर का बुक स्टॉल मिला। रेलवे स्टेशन पर व्हीलर का बुक स्टॉल मिलना अपने आप मे एक उपलब्धि थी। इलाहाबाद की व्हीलर ही एक ऐसी कंपनी थी जिसे देश भर के रेलवे स्टेशनों पर बुक स्टॉल खोलने का एकाधिकार प्राप्त था। कुछ वर्षों बाद मुकुल होर अपनी पत्नी के साथ किशनगंज आ गए। यहाँ भी इन्होंने वर्ष 1969 तक रेलवे स्टेशन पर व्हीलर का बुक स्टॉल चलाया। मिताली होर बताती है कि निजी कारणों से उन्होंने बुक स्टॉल का काम छोड़ दिया। समय बीतता गया, सालो बाद शहर के गांधी चौक पर फ़ास्ट फ़ूड का स्टॉल लगाया, जो अब सुभाष पल्ली चौक पर चल रहा हैं।

ख़ास है मिताली होर की फ़ूडस्टॉल के चाऊमिन और मोमो-

‌पति के देहांत के बाद घर की सारी जिम्मेदारी पुत्र गौतम संभालते है, फ़ूडस्टॉल की लोकप्रियता में मिताली होर का योगदान कम नही है। पिछले 8 सालों से वो रोज शाम 5 बजे दुकान पर आ जाती है।इनकी दुकानदारी रात 11 बजे तक चलती हैं। बात यही खत्म नही होती, ढलती उम्र में भी रोज सुबह 8 बजे से ही वो शाम की दुकानदारी की तैयारी में लग जाती हैं। पुत्र गौतम भावुक होते हुए बताते है कि माँ पिछले 8-9 सालों से मेरे व्यापार की रीढ़ बनी हुई हैं। दुकान में जो ग्राहक आते है वो मेरी माँ को बहुत सम्मान देते हैं। गौतम कहते है कि जब कभी ग्राहकों को दुकान में माँ नही दिखाई देती तो वे हालचाल जानने घर भी पहुंच जाते हैं।

‌मिताली होर कहती है कि हम चाऊमिन और मोमो की क्वालिटी में कोई समझौता नही करते। 20 रुपये से 50 रुपये की कीमत में चाऊमिन से लेकर चिकन मोमो तक उपलब्ध हैं। वे कहती है कि बेटे ने काफी मेहनत की है, मैं तो सिर्फ मदद कर देती हूं।

शाम के 6.30 बज चुके थे। इनके फूडस्टॉल पर 6 युवाओ का एक ग्रुप 4 मोटरसाइकिल पर सवार होकर आता हैं। कुल 6 प्लेट चिकन मोमो का आर्डर प्लेस किया जाता हैं। इन युवाओं में से मो. रब्बानी कहते है कि हम जब स्कूल में थे तब से आंटी के हाथ का मोमो ही खाते है, आज 5 साल बाद हम कॉलेज में है लेकिन इनके मोमो का टेस्ट जस का तस है- बेहतरीन।

मिताली होर खुद नौंवी तक पढ़ी हुई है लेकिन हिंदी, बंगला और अंग्रेजी के शब्दों पर अच्छी पकड़ रखती हैं। उन्होंने अपने बेटे गौतम को भी वर्ष 1989 में मेट्रिक तक पढ़ाया। अब उनकी पोती झारखंड के जमशेदपुर में एक इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ती हैं।

मिताली की बहू भी उनको आदर्श मानती है। वो बताती है कि उनके फ़ूडस्टॉल के सक्सेस के पीछे उनकी सास का ही हाथ है। वे एक बहुत अच्छी कुक है। बेटे गौतम फिर भावुक हो जाते है। गौतम कहते है कि माँ ने बचपन से लेकर अब तक हमे अपनी क्षत्रछाया में ही रखा है। इस उम्र में भी वे खुद हमे संभालती है, हमे बड़ा ही नही होने देती।

1 thought on “मदर्स डे विशेष: कहानी मिताली होर की – स्टेशन पर व्हीलर बुक स्टॉल से लेकर चाऊमिन और मोमो की दुकान तक का सफ़र

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *