आज़ादी के 71 साल: कितना हुआ विकास

आवाज स्पेशल

किशनगंज में उच्चशिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात जैसे मुद्दों पर विशेष रिपोर्ट

 

मो० अनस रहमानी 

देश के सबसे पिछड़े जिलो में एक किशनगंज ने पिछले 7 दशकों में कई योजनाओं के शिलान्यास देखे, कुछ के उद्घाटन भी देखे, बाकी सिर्फ घोषणाएं बन कर रह गई। रेल, सड़क, शिक्षा, उद्योग, सिनेमा, खेल जैसे क्षेत्रों में हुई ज्यादातर घोषणाएं सिर्फ कागज़ों तक ही सिमटी रही। हालांकि किशनगंज को एक स्वतंत्र जिले का दर्जा काफी बाद में मिला लेकिन इससे भी इलाके की पिछड़ेपन की दास्तां में ज्यादा बदलाव नज़र नही आया। देश की संसद में किशनगंज का प्रतिनिधित्व राजनीति के धुरंधरों ने समय-समय पर किया है लेकिन विकास के नाम पर कोई भी नुमाइंदा अपनी छाप नही छोड़ सका।

 

वर्ष 2005 में तत्कालीन केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री स्व. तस्लीमुद्दीन के आग्रह पर जब पीएमओ के निर्देश पर प्लानिंग कमिशन कि 6 सदस्यीय टीम किशनगंज और आसपास के जिलों के विकास का रोडमैप तैयार करने आई थी तब जिले के पिछड़ेपन से जुड़े कई मुद्दे सामने आए, आनन फानन में रिपोर्ट तैयार हुई थी और 5 मुद्दों पर जिले के विकास का रोडमैप तैयार हुआ था। आज भले प्लानिंग कमीशन की जगह नीति आयोग ने ले ली है लेकिन किशनगंज के पिछड़ेपन की जगह विकास अब तक नही ले पाया हैं।

 

1) शिक्षा– जिले में उच्च शिक्षा के लिए, विशेषकर अल्पसंख्यक समुदाय और महिलाओं के लिए एजुकेशन कॉम्प्लेक्स बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया था। डेढ़ दशक बाद आज जिले में एएमयू सेंटर खुला तो सही, मगर इसे अपने अस्तित्व को बचाने का प्रयत्न करना पड़ रहा हैं। यूपीए सरकार ने इस सेंटर को 400 करोड़ अनुदान देने की घोषणा की थी लेकिन अब तक इस सेंटर को सिर्फ 10 करोड़ रुपए मिले हैं। फण्ड नहीं मिलने से एएमयू किशनगंज सेंटर कैंपस में भवन निर्माण का काम अब तक शुरू नहीं हो पाया है। एनजीटी और यूजीसी से जुड़ी खबरों ने भी कई सवाल उठाए हैं। अब हालात ऐसे है कि किशनगंज एएमयू में चल रहे कोर्सेस में बड़ी संख्या में सीटे खाली पड़ी हैं।

 

हालांकि लगभग 1 हज़ार करोड़ की लागत से जिले के अर्राबाड़ी में निर्मित एपीजे अब्दुल कलाम कृषि महाविद्यालय ने जिले में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है लेकिन जो छात्र कृषि के अतिरिक्त अन्य विषयों में अध्ययन करना चाहते है उनकी परेशानियों में कोई कमी नही हुई है।

 

2) स्वास्थ्य- प्लानिंग कमीशन ने किशनगंज में सभी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित मॉडर्न हॉस्पिटल बनाने की बात कही थी। आज किशनगंज सदर अस्पताल के सिवा यहाँ दूसरा बेहतर विकल्प नही है। सदर अस्पताल के अलावा एक भी मॉडर्न सरकारी अस्पताल जिले के किसी भी प्रखंड में नही हैं। किशनगंज में एम्स के खुलने के चर्चाएं भी खूब हुई, लेकिन इस संदर्भ में कुछ ठोस कदम नहीं उठाए गए।

 

3) गलगलिया-सुपौल रेल लाइन प्रोजेक्ट और मेची ब्रिज-

 

प्लानिंग कमीशन ने इलाके के विकास के लिए जब रेल और रोड़, ब्रिज आदि का अध्ययन किया तो दो महत्वपूर्ण निर्णय लिए। कमिशन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि जिले के गलगलिया से लेकर अररिया होते हुए सुपौल तक एक रेल लाइन विकास के दृष्टिकोण से अति महत्वपूर्ण है। गलगलिया से अररिया तक रेल लाइन के रेलवे बोर्ड द्वारा वरीयता के आधार वर्ष 2016 और 2017 के बजट क्रमशः 110 करोड़ और 50 करोड़ रुपयों का आवंटन किया गया, बावजूद इसके अब तक भूमि अधिग्रहण कार्य पूर्ण नही हो पाया हैं।

 

रेल एक्सपर्ट राहुल कनिष्ठ बताते है कि इस रेल लाइन के बनने से असम से दरभंगा और नई दिल्ली से दूरी में और भी कमी आएगी। रेलवे की योजना कर अनुसार नरकटीयागंज-दरभंगा-निर्मली-फारबसीगंज लाईन के चालू होते ही रेलवे अपनी सारी ताकत अररिया गलगलिया नई रेल लाइन पर लगा देगी। यह पूरी रेलवे लाईन दरभंगा वैकल्पिक ईस्ट वेस्ट कारीडोर का रूप ले लेगी।

 

ठाकुरगंज प्रखंड के ही गलगलिया से नेपाल के प्रमुख शहर भद्रपुर को जोड़ने के लिए मेची नदी पर पुल बनाने के मुद्दे पर भी कोई विशेष पहल नही हुई हैं। वर्ष 2017 में भारत और नेपाल के बीच इस हेतु सिर्फ एक एमओयू साइन किया गया हैं, हालांकि नेपाल सरकार द्वारा पहल कर मेची नदी पर एक पुल का निर्माण किया गया है, जिसे शीघ्र ही यातायात हेतु खोल दिया जाएगा।

 

4) आयरन युक्त पेयजल से मुक्ति के लिए योजना-

 

कमिशन की टीम ने सर्वे के दौरान यह पाया कि जिले के जल में आयरन की मात्रा अत्यधिक है, इसलिए यहाँ शुद्ध पेयजल आपूर्ति के लिए वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की आवश्यकता हैं। इस दिशा में शहर में जलमीनारो का निर्माण भी हुआ, लेकिन शुद्ध पेयजल घरो तक पहुंचाने हेतु पाइप लाइनों का नेटवर्क अधूरा ही रह गया। अब बिहार सरकार के सात निश्चय कार्यक्रम अंतर्गत ‘हर घर नल जल’ योजना से शुद्ध पेयजल मुहैया कराने के कार्यक्रम को बल मिलता नज़र आ रहा हैं।

 

5) बाढ़ नियंत्रण आज भी समस्या है-

 

प्लानिंग कमिशन ने जिले में हमेशा आने वाली बाढ़ से बचाव के लिए तीन बिंदुओं पर कार्य करने की बात कही थी। कनकई, महानन्दा, बख्रा, परमान, नुना और कोल नदी पर बाढ़ नियंत्रण के तकनीकी उपाय, राष्ट्रीय उच्च पथ के दोनों ओर तटबंध अथवा भराव और जिले की बंजर भूमि का विकास करने की योजनाओं पर बल दिया था। लेकिन एक दशक से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी इस दिशा में कोई ठोस प्रयास नही हुए। महत्वाकांक्षी महानन्दा बेसिन परियोजना भी कागज़ों में ही सिमट कर रह गई।

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